आखिर हर शादी में फूफा जी रूठते क्यों है ?

शादियों की अपनी एक अलग ही दुनिया होती है। कहीं दूल्हे के जूते छिपाए जा रहे होते हैं, कहीं बच्चे आइसक्रीम पर हमला कर रहे होते हैं और कहीं फोटोग्राफर खाने की प्लेट हाथ में लिए लोगों को जबरन मुस्कुराने के लिए कह रहा होता है।

आखिर हर शादी में फूफा जी रूठते क्यों है ?
आखिर हर शादी में फूफा जी रूठते क्यों है ?

लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा व्यक्ति भी होता है, जिसकी उपस्थिति के बिना शादी अधूरी मानी जाती है। वह व्यक्ति न तो दूल्हा होता है, न दुल्हन, न पंडित और न ही हलवाई। फिर भी पूरे परिवार का ध्यान समय-समय पर उसी की ओर चला जाता है।

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं—फूफा जी की!

वैसे तो पिता की बहन के पति को फूफा कहा जाता है। रिश्ते में उनका स्थान बेहद सम्मानजनक होता है। लेकिन शादी-ब्याह के अवसर पर कुछ फूफा जी अपने सम्मान की नियमित जाँच करवाना भी आवश्यक समझते हैं।

जीप की अगली सीट और फूफा जी का सम्मान

बचपन की एक घटना मुझे आज भी याद है।

परिवार में शादी थी और बारात जाने के लिए एक जीप तैयार खड़ी थी। बच्चों के लिए जीप की अगली सीट किसी राजसिंहासन से कम नहीं होती। मैं भी मौका देखकर दौड़ा और दूल्हे के बगल वाली सीट पर जाकर बैठ गया।

मन ही मन बड़ी खुशी हो रही थी कि आज पूरी बारात मुझे दूल्हे के साथ अगली सीट पर बैठा देखेगी। लेकिन मेरी यह खुशी कुछ ही मिनटों की मेहमान थी।

तभी ताऊ जी आए और बोले—

“बेटा, पीछे बैठ जाओ। यहाँ फूफा जी बैठेंगे।”

उस समय ऐसा लगा जैसे किसी ने बनी-बनाई सरकार गिराकर मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली हो। मन तो बहुत दुखी हुआ, लेकिन फूफा जी के सम्मान के सामने एक बच्चे की अगली सीट वाली इच्छा कहाँ टिक सकती थी!

फूफा जी आए, आराम से अगली सीट पर बैठे और जीप चल पड़ी। मैं पीछे बैठकर यही सोचता रहा कि आखिर फूफा बनने के बाद आदमी को अगली सीट अपने आप कैसे मिल जाती है?

बाद में समझ आया कि भारतीय परिवारों में कुछ पद चुनाव से नहीं, रिश्तेदारी से प्राप्त होते हैं।

फूफा जी का सम्मान-मापक यंत्र –

हर फूफा जी नाराज़ नहीं होते। अधिकतर फूफा जी हँसमुख, समझदार और परिवार का ध्यान रखने वाले होते हैं।

  • किसने नमस्ते की?
  • किसने नमस्ते नहीं की?
  • चाय सबसे पहले किसे मिली?
  • गाड़ी में कौन-सी सीट दी गई?
  • कमरे में कूलर था या सिर्फ पंखा?
  • नाश्ते में मिठाई एक मिली या दो?
  • स्टेज पर फोटो खिंचवाते समय उन्हें आगे खड़ा किया गया या पीछे?

इनमें से किसी भी प्रश्न का उत्तर फूफा जी की अपेक्षा के अनुसार न हो, तो सम्मान-मापक यंत्र तुरंत खतरे की घंटी बजा देता है।

नाराज़गी की शुरुआत कैसे होती है?

फूफा जी की नाराज़गी अचानक दिखाई देती है, लेकिन उसका कारण अक्सर बहुत छोटा होता है।

संभव है किसी बच्चे ने उनका नाम लेकर कमरा न बताया हो। संभव है चाय पहुँचने में पाँच मिनट की देरी हो गई हो। यह भी संभव है कि परिवार के किसी सदस्य ने स्वागत करते समय कहा हो—

“फूफा जी, आप भी आ गए?”

यहाँ समस्या “आप” या “आ गए” में नहीं होती। असली समस्या उस “भी” शब्द में छिपी होती है।

फूफा जी सोचने लगते हैं—“हम भी आ गए का क्या मतलब? क्या हमारे आने की उम्मीद नहीं थी?”

बस, यहीं से शादी में एक नई उपकथा शुरू हो जाती है।

नाराज़ फूफा जी की पहचान –

नाराज़ फूफा जी को पहचानना कठिन नहीं है। वे पंडाल के किसी शांत कोने में कुर्सी पर बैठे मिलेंगे। चेहरे पर गंभीरता होगी और निगाहें ऐसी होंगी जैसे पूरे आयोजन का गोपनीय निरीक्षण कर रहे हों।

कोई पूछेगा—

“फूफा जी, खाना खा लिया?”

उत्तर मिलेगा—

“हमें भूख नहीं है।”

जबकि उनकी नजर लगातार भोजन वाले काउंटर पर टिकी होगी।

दूसरा व्यक्ति मनाने आएगा—

“चलिए फूफा जी, खाना लग गया है।”

इस बार उत्तर आएगा—

“आप लोग खाइए, हमें कौन-सा पहली बार खाना देखना है।”

कुछ देर बाद बुआ जी आएँगी और बिना किसी लंबी चर्चा के कहेंगी—

“चलो, चुपचाप खाना खा लो। सुबह से कुछ नहीं खाया है।”

इसके बाद फूफा जी उठ तो जाएँगे, लेकिन चेहरे के भाव ऐसे ही रखेंगे जैसे वे खाना खाने नहीं, परिवार पर कोई बड़ा उपकार करने जा रहे हों।

मनाने वालों की विशेष समिति –

जैसे ही फूफा जी के नाराज़ होने की सूचना मिलती है, परिवार में तुरंत एक अनौपचारिक समिति बना दी जाती है।

इस समिति में आमतौर पर ये लोग शामिल होते हैं:

* एक समझदार ताऊ जी
* दो खाली घूमते चचेरे भाई
* परिवार का कोई हँसमुख सदस्य
* और अंत में सबसे प्रभावशाली सदस्य—बुआ जी

पहले चरण में फूफा जी से पूछा जाता है—

“क्या हुआ?”

जवाब मिलता है—

“कुछ नहीं।”

भारतीय रिश्तेदारी में “कुछ नहीं” का अर्थ अक्सर यही होता है कि बहुत कुछ हुआ है और अब आपको स्वयं पता लगाना होगा।

दूसरे चरण में उनसे कहा जाता है—

“आप तो घर के बड़े हैं।”

यह वाक्य काफी प्रभावशाली होता है। इससे फूफा जी के चेहरे पर थोड़ा परिवर्तन आता है, लेकिन वे तुरंत मानते नहीं हैं। सम्मान की वापसी धीरे-धीरे स्वीकार की जाती है, ताकि मनाने वालों को भी अपनी मेहनत का महत्व समझ आए।

नए जीजा से छिपी हुई प्रतिस्पर्धा –

हर परिवार में समय के साथ नए रिश्ते जुड़ते रहते हैं। कभी जो व्यक्ति अकेला जीजा हुआ करता था, कुछ वर्षों बाद उसी परिवार में नए जीजा आ जाते हैं।

नए जीजा युवा होते हैं, नए कपड़े पहनते हैं, मोबाइल से शानदार तस्वीरें खींचते हैं और दुल्हन की सहेलियों के बीच लोकप्रिय भी हो जाते हैं। परिवार के लोग उनके स्वागत में अधिक व्यस्त दिखाई देते हैं।

पुराने जीजा, जो अब फूफा जी बन चुके होते हैं, दूर से यह सब देखते हैं।

उन्हें अपने पुराने दिन याद आने लगते हैं—जब उनके आने पर पूरा घर सक्रिय हो जाता था, मिठाई का डिब्बा अलग खुलता था और बैठने के लिए सबसे अच्छी कुर्सी दी जाती थी।

अब वही कुर्सी किसी नए जीजा के पास देखकर उनके भीतर का इतिहास विभाग जाग उठता है।

वे कुछ कहते नहीं, लेकिन उनका चेहरा स्पष्ट संदेश देता है—

“जिस रास्ते पर तुम आज चल रहे हो, उसके संस्थापक सदस्य हम हैं।”

भोजन व्यवस्था की समीक्षा –

शादी में फूफा जी भोजन सिर्फ खाते नहीं हैं, उसकी समीक्षा भी करते हैं।

दाल में नमक कम हो तो उन्हें तुरंत पता चल जाता है। पूड़ी ठंडी हो तो वे व्यवस्था पर सवाल उठा सकते हैं। पनीर में पनीर कम और ग्रेवी ज्यादा हो, तो यह विषय अगली तीन पारिवारिक बैठकों तक चल सकता है।

खाना चाहे कितना भी अच्छा हो, व्यंग्य वाले फूफा जी एक सुधार अवश्य सुझाएँगे—

“सब ठीक था, बस व्यवस्था थोड़ी और अच्छी हो सकती थी।”

कोई यह पूछने की हिम्मत नहीं करता कि आखिर कमी कहाँ थी। क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर मिल गया तो मिठाई ठंडी होने तक चर्चा समाप्त नहीं होगी।

फोटो में स्थान भी महत्वपूर्ण है –

शादी की सामूहिक तस्वीर रिश्तेदारों के लिए केवल तस्वीर नहीं होती, वह पारिवारिक पदक्रम का स्थायी प्रमाण होती है।

यदि फूफा जी को आगे बुलाया गया, तो सब ठीक है। लेकिन यदि फोटोग्राफर ने अनजाने में कह दिया—

“अंकल जी, थोड़ा पीछे हो जाइए।”

तो मामला गंभीर हो सकता है।

फोटोग्राफर को भले ही रिश्तों की जानकारी न हो, लेकिन उसके एक वाक्य का परिणाम पूरे परिवार को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए समझदार परिवार फोटो से पहले ही फोटोग्राफर को बता देते हैं—

“इनको आगे ही रखना। ये हमारे फूफा जी हैं।”

बुआ जी के सामने सारी रणनीति समाप्त –

शादी में बाकी लोग चाहे जितनी कोशिश कर लें, फूफा जी को पूरी तरह नियंत्रित करने की शक्ति प्रायः बुआ जी के पास ही होती है।

परिवार वाले आधे घंटे से उन्हें मना रहे होंगे। कोई चाय ला रहा होगा, कोई कुर्सी ठीक कर रहा होगा और कोई उनकी प्रशंसा कर रहा होगा।

फिर बुआ जी आएँगी और केवल इतना कहेंगी—

“बहुत हो गया। अब सीधे चलो।”

फूफा जी एक क्षण परिवार के सदस्यों को देखेंगे, फिर धीरे से उठकर बुआ जी के पीछे चल देंगे।

इस दृश्य से यह प्रमाणित हो जाता है कि हर शक्तिशाली पद के ऊपर भी कोई न कोई उच्च अधिकारी अवश्य होता है।

हर फूफा जी ऐसे नहीं होते –

यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सभी फूफा जी नाराज़ या अकड़ने वाले नहीं होते। बहुत से फूफा जी शादी की जिम्मेदारियाँ संभालते हैं, बच्चों के साथ हँसी-मजाक करते हैं और मुश्किल समय में परिवार के सबसे पहले काम आते हैं।

यह लेख वास्तविक रिश्तों का मूल्यांकन नहीं, बल्कि भारतीय शादियों में वर्षों से सुनाई जाने वाली एक हास्यपूर्ण छवि पर आधारित व्यंग्य है।

सच्चाई यह भी है कि शादी के तनाव, भागदौड़ और अव्यवस्था के बीच किसी भी रिश्तेदार का मूड बिगड़ सकता है। कभी मामा नाराज़ होते हैं, कभी जीजा और कभी दूल्हे के दोस्त। लेकिन न जाने क्यों बदनामी सबसे अधिक फूफा जी के हिस्से में आ गई है।

भविष्य में हम भी फूफा हो सकते हैं –

इसलिए अगली बार किसी शादी में कोई फूफा जी थोड़े गंभीर दिखाई दें, तो उन पर तुरंत मत हँसिए। हो सकता है उन्हें सच में चाय न मिली हो। हो सकता है उनका कमरा किसी और को दे दिया गया हो। और यह भी संभव है कि किसी बच्चे ने उनकी अगली सीट पर कब्जा कर लिया हो।

उन्हें सम्मान से बुलाइए, भोजन कराइए और सामूहिक तस्वीर में आगे खड़ा कर दीजिए। शादी भी शांति से पूरी हो जाएगी और रिश्तेदारी भी मजबूत बनी रहेगी।

आखिर समय का पहिया घूमता रहता है। आज हम पीछे की सीट पर बैठे बच्चे हैं, कल नए जीजा होंगे और एक दिन संभव है कि हम भी किसी शादी में अपनी अगली सीट खोजते हुए फूफा जी बन जाएँ।

इसलिए फूफा जी पर हँसिए जरूर—लेकिन उनके साथ, उनके ऊपर नहीं!

अस्वीकरण: यह एक काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है। इसका उद्देश्य किसी रिश्ते, व्यक्ति या वर्ग का अपमान करना नहीं है। इसमें प्रस्तुत परिस्थितियाँ केवल मनोरंजन के लिए हैं। किसी वास्तविक व्यक्ति अथवा घटना से समानता संयोग मात्र मानी जाए।

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