कॉकरोच जनता पार्टी: सरकार के खिलाफ या व्यवस्था के खिलाफ?

अभी कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि पूरा यूट्यूब और मीडिया केवल कॉकरोच / कॉकरोच कर रहा है। हर एक इंसान दूसरे को भड़का रहा है। जिसमें विवेक है, वो सुरक्षित रहेगा, लेकिन बाकी का क्या?  आज मैं अपनी “Instagram Virals” कैटेगरी के अंतर्गत इसी विषय पर बात करूँगा।

कॉकरोच जनता पार्टी: सरकार के खिलाफ या व्यवस्था के खिलाफ?

मेरा सवाल सीधा है — क्या Cockroach Janta Party नाम का यह तथाकथित Gen-Z आंदोलन सरकार से जवाबदेही मांगने वाला आंदोलन है, या धीरे-धीरे व्यवस्था और बाबा भीमराव आंबेडकर जी के संविधान के प्रति अविश्वास पैदा करने वाला मंच बन सकता है?

हालिया विवाद में ‘कॉकरोच’ शब्द चर्चा में आया, जब CJI Surya Kant की एक टिप्पणी को लेकर बहस शुरू हुई। हालांकि बाद में चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि उनके बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया था और उनकी टिप्पणी सामान्य युवाओं या जनता के लिए नहीं थी।

अभी हाल ही में पंजाब और कई अन्य राज्यों में कुछ राजनीतिक नेताओं द्वारा देश में Gen-Z आंदोलन की बात इशारों-इशारों में उठाई जा रही थी। इसमें NEET पेपर लीक जैसे मुद्दों को युवाओं के असंतोष का आधार बनाकर आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई देती है।

ऐसा होने की संभावना तब और अधिक महसूस होती है, जब हाल ही में देश के रक्षामंत्री ने देश को नक्सलवाद से मुक्त होने की दिशा में बड़ी सफलता बताया। हालांकि बहुत से लोग अब भी यह मानते हैं कि नक्सलवाद का वैचारिक रूप, जिसे कुछ लोग “अर्बन नक्सल” कहते हैं, अभी भी शहरों और संस्थाओं में मौजूद है।

इसी बीच उत्तर भारत से यह राजनीतिक संदेश भी आया कि जिन राज्यों में वामपंथी या कथित रूप से हिन्दू-विरोधी राजनीति मजबूत मानी जाती थी, वहां भी उनका प्रभाव कमजोर होता दिख रहा है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या नए तरह के आंदोलन सच में जनता के मुद्दों के लिए हैं, या वे किसी बड़े वैचारिक संघर्ष का हिस्सा हैं?

इसके बाद CJI Surya Kant द्वारा एक वकील को फटकार लगाते समय “परजीवी” और “कॉकरोच” जैसे शब्दों के इस्तेमाल को लेकर विवाद हुआ। बाद में चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी फर्जी डिग्रियों के माध्यम से लॉ पेशे में प्रवेश करने वालों के संदर्भ में थी, न कि देश के युवाओं या किसी सामान्य नागरिक के लिए।

Gen-Z आंदोलन की बात आती है तो दुनिया के कई देशों में युवाओं के असंतोष की तस्वीर सामने आती है। ईरान में भी जनता का एक बड़ा वर्ग अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरा था। वहां मामला केवल एक आंदोलन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मानवाधिकार, सत्ता परिवर्तन, तेल, यूरेनियम और वैश्विक राजनीति जैसे मुद्दे भी उससे जुड़ते चले गए।

Gen-Z आंदोलन सामान्यतः भ्रष्टाचार से नाराजगी जैसे मुद्दों पर खड़ा होता है, और लोकतंत्र में ऐसे सवाल उठना स्वाभाविक भी है। लेकिन असली सवाल यह है कि भ्रष्टाचार किस स्तर पर है? क्या डीजल, पेट्रोल और गैस के दाम केवल भ्रष्टाचार के कारण बढ़ते हैं, या इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार, युद्ध, आयात निर्भरता और वैश्विक सप्लाई जैसे कारण भी होते हैं?

इसलिए किसी भी आंदोलन को केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्य, कारण और परिणाम—तीनों के आधार पर समझना चाहिए।

यह स्थिति कई बार घर-परिवार जैसी लगती है। जब तक पिता अपने बच्चे को जेब खर्च देता रहता है, तब तक सब ठीक लगता है। लेकिन किसी मजबूरी में वह खर्च कम कर दे, तो बच्चा तुरंत नाराज हो जाता है और यह समझने की कोशिश नहीं करता कि शायद इसके पीछे कोई बड़ा कारण भी हो सकता है।

देश और सरकार के मामले भी कई बार ऐसे ही होते हैं। महंगाई, पेट्रोल-डीजल या गैस के दाम जैसे मुद्दों पर जनता का सवाल उठाना बिल्कुल सही है, लेकिन केवल गुस्से में निष्कर्ष निकालना भी ठीक नहीं। जरूरी है कि हम यह देखें कि समस्या केवल सरकार की नीयत से जुड़ी है या अंतरराष्ट्रीय बाजार, युद्ध, आयात और वैश्विक परिस्थितियों से भी प्रभावित है।

सत्य का साथ देने के लिए धर्म, जाति या विचारधारा से ऊपर उठकर विवेक की जरूरत होती है। असत्य और आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर आंदोलन करना समाज को सही दिशा में नहीं ले जाता। इसलिए किसी भी मुद्दे पर निर्णय लेने से पहले तथ्य, कारण और परिणाम—तीनों को समझना जरूरी है।

मेरी चिंता यह है कि CJI Surya Kant की जिस टिप्पणी को बाद में स्पष्ट किया गया, उसी टिप्पणी और उदाहरण को कुछ लोग राजनीतिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। CJI का आशय चाहे कुछ भी रहा हो, लेकिन सोशल मीडिया और राजनीति में कई बार किसी बयान को उसके मूल संदर्भ से हटाकर नया अर्थ दे दिया जाता है।

अगर “कॉकरोच जनता पार्टी”  केवल बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, NEET जैसी परीक्षाओं की पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर सवाल उठाते हैं, तो यह लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल भी देश, समाज और वैश्विक परिस्थितियों को समझते हुए होना चाहिए।

अगर किसी आंदोलन के बहाने न्यायपालिका, संविधान या संवैधानिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास फैलाने की कोशिश होती है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

यह आवश्यक नहीं कि असंतोष से उपजा हर आंदोलन देश को बेहतर दिशा में ही ले जाए। ईरान में हुए प्रदर्शन और हमारा अपना इतिहास बताते हैं कि सत्ता का खालीपन या अराजकता कई बार ऐसे हाथों में भी चली जाती है, जो समाज और राष्ट्र के हित में नहीं होते। भारत का इतिहास मुगलों और ब्रिटिश शासन के अनुभवों से यह सिखाता है कि केवल वर्तमान सत्ता से नाराजगी काफी नहीं होती; यह भी देखना जरूरी है कि विकल्प कौन है, उसकी नीयत क्या है और वह देश को किस दिशा में ले जाना चाहता है।

चार दिन में एक करोड़ से ज्यादा सब्सक्राइबर कैसे?

यह अपने आप में बड़ा सवाल है। किसी भी नए ऑनलाइन अभियान का केवल एक-दो वायरल पोस्ट के आधार पर इतनी तेजी से करोड़ों लोगों तक पहुंच जाना सामान्य बात नहीं लगती। ऐसा तभी संभव दिखता है जब पहले से बड़े follower base वाले सोशल मीडिया चैनल, यूट्यूबर्स, पत्रकार या राजनीतिक कार्यकर्ता इस मुहिम को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाएं।

इसलिए चार दिन में एक करोड़ से ज्यादा subscribers होना यह साबित नहीं करता कि पूरा भारत अचानक इस आंदोलन के साथ खड़ा हो गया है। आज के समय में कई सोशल मीडिया हैंडल्स, यूट्यूब चैनल्स और वैचारिक नेटवर्क ऐसे हैं जिनके followers किसी राजनीतिक पार्टी के official subscribers से भी ज्यादा हो सकते हैं। इसलिए किसी अभियान की असली ताकत केवल subscribers या followers से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य, नेतृत्व, funding, जमीन पर असर और जनता की वास्तविक भागीदारी से समझनी चाहिए।

उदाहरण के लिए मान लीजिए पांच बड़े सोशल मीडिया चेहरों के पास 3-3 million subscribers हैं। यदि ये सभी अपने-अपने followers से किसी नए मंच को follow करने की अपील करें, तो उस अभियान की संभावित digital reach 15 million यानी लगभग 1.5 करोड़ लोगों तक हो सकती है। इसलिए किसी मंच के subscribers तेजी से बढ़ना यह साबित नहीं करता कि पूरा देश उस आंदोलन के साथ खड़ा हो गया है; यह बड़े digital networks के coordinated push का परिणाम भी हो सकता है।

ऐसे समूहों में प्रचारित वीडियो कैसे होते हैं?

ऐसे ऑनलाइन समूहों में कई बार ऐसे वीडियो और पोस्ट देखने को मिलते हैं, जिनमें व्यक्ति पहले खुद को “हिन्दू” बताता है, फिर यह साबित करने की कोशिश करता है कि वह देश-विरोधी नहीं है। वह कहता है कि उसे हनुमान चालीसा आती है, वंदे मातरम् आता है, वह भारतीय संस्कृति को मानता है, फिर भी वह इस आंदोलन या मंच से जुड़ा है।

पहली नजर में यह सामान्य बात लग सकती है, लेकिन इसका असर यह होता है कि संदेश सीधे हिन्दू समाज के भीतर विश्वास बनाने और फिर उसे अलग-अलग विचारधाराओं में बांटने की कोशिश करता है। मेरा मानना है कि ऐसे अभियानों में पहचान, जाति, अधिकार और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करके समाज के भीतर भ्रम और विभाजन पैदा किया जा सकता है।

समस्या यह नहीं कि कोई व्यक्ति सरकार से सवाल पूछे। लोकतंत्र में सवाल पूछना अधिकार है। समस्या तब शुरू होती है जब किसी आंदोलन में समाज के एक बड़े वर्ग को भावनात्मक रूप से निशाना बनाकर उसके भीतर अविश्वास, अपराधबोध या विभाजन पैदा किया जाए।

इसलिए किसी भी वीडियो या पोस्ट को केवल इस आधार पर सच न मानें कि बोलने वाला व्यक्ति खुद को किसी धर्म, जाति या विचारधारा से जोड़ रहा है। असली सवाल यह होना चाहिए कि वह क्या कह रहा है, उसका स्रोत क्या है, उसका उद्देश्य क्या है और उसका परिणाम समाज को जोड़ने वाला है या तोड़ने वाला।

इसलिए असली सवाल यह है कि यह आंदोलन सरकार से जवाबदेही मांगने वाला आंदोलन रहेगा, या CJI की टिप्पणी के प्रतीक को पकड़कर संविधान और व्यवस्था के खिलाफ भावनाएं भड़काने का माध्यम बनेगा?

मेरा मानना है कि किसी भी आंदोलन को भावनाओं के बजाय सत्य, विवेक और तथ्यों के आधार पर समझना चाहिए। धर्म और राष्ट्रभक्ति का प्रमाण देकर अगर कोई व्यक्ति समाज को जोड़ने के बजाय संदेह और विभाजन की ओर ले जाता है, तो उसके संदेश को और सावधानी से परखना चाहिए।

डिस्क्लेमर: यह लेख लेखक के निजी विचारों और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय, संस्था या संवैधानिक पद की अवमानना करना नहीं है। यदि किसी तथ्य में त्रुटि हो तो कृपया सुधार के लिए सूचित करें।

Source –
रक्षा मंत्री ने देश को नक्सलवाद मुक्त बताया
पंजाब/कई राज्यों के नेताओं ने Gen-Z आंदोलन की अपील की
योगेंद्र यादव/पत्रकारों ने Cockroach Janta Party (CJP) join करने की अपील की

CJI Surya Kant Clarifies ‘Cockroach’ Remark

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